सदन में बिखरे रंग, CM भजनलाल की कविता के संग !

फागुन आया, रंग लाया,
सच का दर्पण संग लाया।
आज सदन में रंग बिखरें हैं ,
सच के चेहरे खुद निखरें हैं ।

हमने पसीने से रंग घोला,
धरती पर विश्वास बोला।
जनता के हर एक सपने को,
मेहनत से आकार पिरोया।

पर उधर विपक्ष निराला है,
हर मौसम में काला है।
होली में भी रंग नहीं 
केवल आरोपों का जंजाला है।

हम गुलाल विकास का लाएँ,
वे भ्रम की धूल उड़ाएँ।
हम आंकड़ों से बात करें,
वे बस शोर मचाएँ, चिल्लाएँ।

इनकी पिचकारी में पानी कम,
ज्यादा केवल हवा भरी।
जब-जब सच का रंग चढ़े,
इनका नक़ली रंग झड़े।

दो बरस में काम किया है,
धरती ने परिणाम दिया है।
मुद्दों में जिनकी पकड़ नहीं,
वे बस आरोपों में उलझे रहे।

होली है ,तो सच भी बोलें,
रंग नहीं अब मुखौटे खोलें।
जनता की आँखें तेज बहुत हैं,
अब छल के रंग नहीं घोले।

हम पर छींटे जितने मारो,
हम उतना ही और निखरेंगे।
सेवा का रंग गहरा होता 
ये रंग कभी ना उतरेंगे।

फागुन की यह गूंज पुकारे 
कर्म ही असली रंग हमारे।
जो केवल भाषण रंगते हैं,
वक़्त उन्हें खुद ही उतारे।

आज होली पर इतना कह दूँ 
रंग बदलना आसान बहुत,
पर जनता का जो रंग चढ़े,
उसे मिटाना असंभव है।

फागुन आया, रंग लाया,
सच का दर्पण संग लाया।
आज सदन में रंग बिखरें हैं,
सच के चेहरे खुद निखरें हैं।

हमने पसीने से रंग घोला,
धरती पर विश्वास बोला।
जनता के हर एक सपने को,
मेहनत से आकार पिरोया।

पर पिछली सत्ता का हाल निराला,
पेपर लीक का खेल ही काला।
मेहनत करती थी युवा पीढ़ी,
प्रश्नपत्र बिके, व्यवस्था ढीली।

भ्रष्टाचार के रंग चढ़ाए,
अपनों में ही तीर चलाए।
आपसी लड़ाई, कुर्सी की जंग,
जनता रही बस देखती दंग।

तुष्टिकरण की चली पिचकारी,
वोटों की थी पूरी तैयारी।
न न्याय मिला, न रोज़गार,
बेरोज़गारी का बढ़ता भार।

महंगाई से घर-घर रोया,
अपराध ने खुलकर पाँव पसराया।
कानून व्यवस्था मौन खड़ी थी,
आम जन की आवाज़ दबी थी।

अब बदला है रंग जमाना,
सेवा को हमने धर्म माना।
पेपर लीक पर रोक कड़ी है,
भर्ती प्रक्रिया पारदर्शी खड़ी है।

रोज़गार के द्वार खुलाए,
युवाओं के सपने सजाए।
“राइजिंग राजस्थान” का नारा,
निवेश, उद्योग, विकास हमारा।

अपराध पर अब प्रहार हुआ,
कानून का फिर से राज हुआ।
माफिया चाहे कितना दौड़े,
कानून के आगे घुटने जोड़े।

किसानों के खेतों में खुशहाली,
सिंचाई, बीज और मदद निराली।
मेहनतकश का सम्मान बढ़ाया,
गाँव-गाँव तक विकास पहुँचाया।

हम आंकड़ों से बात करें,
काम के रंग दिन-रात भरें।
वे केवल शोर मचाते हैं,
झूठे रंग उछाल छिपाते हैं।

सदन में जो गरजे थे तुम,
“चौकड़ी भुला दूँगा” कहकर।
इतिहास बदलने निकले थे,
जनता ने चौकड़ी तुम्हे भुला दी ।

तुम भूलाने की बात करोगे,
हम याद दिलाने आए हैं।
किसने क्या किया प्रदेश में,
सब हिसाब बताने आए हैं।

आज होली पर चेतावनी है,
अब भ्रम का बाज़ार नहीं चलेगा।
जनता का विश्वास जो जीता,
उसे कोई साज़िश से नहीं ढहाएगा।

होली है तो सच भी बोलें,
रंग नहीं अब मुखौटे खोलें।
जनता की आँखें तेज बहुत हैं,
अब छल के रंग नहीं घोलें।

हम पर छींटे जितने मारो,
हम उतना ही और निखरेंगे।
सेवा का रंग गहरा होता,
ये रंग कभी ना उतरेंगे।

फागुन की यह गूंज पुकारे,
कर्म ही असली रंग हमारे।
जो केवल भाषण रंगते हैं,
वक़्त उन्हें खुद ही उतारे।

होली है तो हँस भी लें हम,
थोड़ा व्यंग्य भी घोल चलें।
रंग बदलने वालों को देखो,
पहले पानी से ही धुल चलें!

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