नगर निगम के इंजीनियर कोर्ट में, शहर भगवान भरोसे!

जयपुर, 23 फरवरी 2026(न्याय स्तंभ)। जयपुर नगर निगम में इन दिनों एक अजीब हालात बने हुए हैं। जिस विभाग का जो काम है, वह छोड़कर दूसरे काम में लगाया जा रहा है और इसका खामियाज़ा सीधे शहर और आम जनता को भुगतना पड़ रहा है।

हम बात कर रहे हैं नगर निगम की अभियांत्रिकी शाखा की। जहां कार्यरत इंजीनियर, जिनका मूल दायित्व अतिक्रमण हटाना, भवन निर्माण की स्वीकृतियाँ देना, सिविल कार्यों की मॉनिटरिंग करना और अवैध निर्माणों पर कार्रवाई करना है, वही इंजीनियर अब कोर्ट केस की फाइलें तैयार करने में जुटे हुए हैं।
 

कानूनी शाखा में जॉइंट लॉ ऑफिसर (JLO) के पद पर भारी कमी है। एक-एक JLO के पास पांच-पांच जोन का काम है। ऐसे में फाइलों का बोझ बढ़ता जा रहा है और नतीजा यह कि इंजीनियरों को कानून के मामलों में झोंक दिया गया है।
सवाल यह है कि जब एक JLO के पास पांच जोन का काम है, तो क्या यह व्यवस्था व्यावहारिक है? और अगर नहीं, तो इसका खामियाज़ा शहर क्यों भुगते?
 

मूल काम ठप, अवैध निर्माण धड़ल्ले से

इधर इंजीनियर कोर्ट केस की तैयारी में लगे हैं, उधर शहर में बेतरतीब निर्माण और अवैध अतिक्रमण धड़ल्ले से बढ़ रहे हैं। अवैध बेसमेंट बन रहे हैं, बिना स्वीकृति के बहुमंजिला इमारतें खड़ी हो रही हैं सड़क और नालों पर कब्जे हो रहे हैं सिविल कार्यों की मॉनिटरिंग कमजोर पड़ रही है। जब फील्ड में मौजूद रहने वाला स्टाफ फाइलों में उलझ जाएगा, तो ज़मीन पर कार्रवाई कौन करेगा?

जिम्मेदारी तय क्यों नहीं?
नगर निगम प्रशासन पर सीधा सवाल खड़ा होता है कि  क्या अभियांत्रिकी शाखा को कानूनी शाखा का बैकअप बनाना ही समाधान है? क्या JLO की रिक्तियों को भरना अधिक जरूरी नहीं?
क्या यह प्रशासनिक असफलता नहीं कि जिस काम के लिए विशेषज्ञ रखे गए हैं, उन्हें उनके मूल कार्य से हटाकर दूसरे काम में लगाया जा रहा है?
यह व्यवस्था न तो कानूनी मामलों को तेजी से निपटा पा रही है और न ही इंजीनियरिंग के काम समय पर हो पा रहे हैं। नतीजा—दोनों तरफ काम पेंडिंग, और जनता परेशान।

“जिसका काम, उसी के पास”
नगर निगम में तत्काल प्रभाव से यह स्पष्ट नीति बननी चाहिए कि: इंजीनियर अपने मूल कार्य — अतिक्रमण हटाने, निर्माण स्वीकृति, सिविल मॉनिटरिंग — पर ही केंद्रित रहें। कानूनी मामलों के लिए पर्याप्त JLO और विधि स्टाफ की नियुक्ति की जाए।

जोन स्तर पर जिम्मेदारी तय कर समयबद्ध निस्तारण की व्यवस्था हो।
अगर अभी भी सुधार नहीं हुआ, तो शहर में अवैध निर्माण और अतिक्रमण की स्थिति और भयावह हो सकती है।
नगर निगम के जिम्मेदार अधिकारियों को यह समझना होगा कि विभागों की जिम्मेदारियों का बंटवारा कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि शहर की व्यवस्था का आधार है। अब वक्त आ गया है कि फाइलों की राजनीति बंद हो और ज़मीन पर काम शुरू हो — वरना जनता सवाल पूछना जानती है।

Related Articles