जयपुर, 15 अप्रैल 2026 (न्याय स्तंभ)। जयपुर के गोपालपुरा बाइपास स्थित भंडारी हॉस्पिटल पर हुई छापेमारी के बाद सामने आया मामला अब कार्रवाई से ज्यादा सिस्टम की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर रहा है।
Central Drugs Standard Control Organization (CDSCO) और राजस्थान ड्रग कंट्रोल विभाग की संयुक्त कार्रवाई में यह सामने आया कि ‘ट्राइमेक्स’ नाम से एक ऐसा इंजेक्शन बेचा जा रहा था, जो ड्रग विभाग में रजिस्टर्ड नहीं है। इसके अलावा इस प्रकार के कॉम्बिनेशन को इस तरह बाजार में ब्रांड बनाकर बेचना नियमों के खिलाफ माना गया है।
ड्रग कंट्रोल ने गड़बड़ी मानी, पत्र लिखकर पूरी की प्रक्रिया
राजस्थान ड्रग कंट्रोलर अजय फाटक ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि संबंधित इंजेक्शन अप्रमाणिक है और उसका इस तरह उपयोग व बिक्री नियमों के विपरीत है। हालांकि, इसके बाद विभाग की ओर से संबंधित डॉक्टर के खिलाफ कार्रवाई के लिए मामला Rajasthan Medical Council को भेज दिया गया।
यहीं पर सवाल खड़ा होता है कि क्या इतनी गंभीर अनियमितता के बाद विभाग की भूमिका सिर्फ पत्र लिखने तक सीमित रह गई?
जांच पूरी, लेकिन कार्रवाई अब भी अधर में
मामले में जांच एजेंसियों द्वारा:
अस्पताल से दस्तावेज जब्त किए गए
दवाइयों को अप्रमाणिक माना गया
संबंधित प्रकरण को आगे कार्रवाई के लिए भेजा गया लेकिन इसके बावजूद अब तक अस्पताल पर कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है।
-वहीं संबंधित डॉक्टर पर कोई स्पष्ट अनुशासनात्मक कदम नहीं दिखा
-मामले की प्रगति को लेकर कोई आधिकारिक अपडेट नहीं है
-यह स्थिति पूरे प्रकरण को संदेह के दायरे में ला खड़ा करती है।
अस्पताल प्रशासन ने जिम्मेदारी से किया किनारा
मामले में अस्पताल प्रशासन ने खुद को अलग बताते हुए सारा ठीकरा एक कर्मचारी पर फोड़ दिया। हालांकि, यह तर्क कई सवालों को जन्म देता है। इतने बड़े अस्पताल में बिना प्रशासन की जानकारी के इस प्रकार की गतिविधियां संचालित होना संभव है या नहीं, यह जांच का विषय है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मरीजों के इलाज में उपयोग होने वाली दवाओं की निगरानी और जवाबदेही अंततः संस्थान की ही होती है।
अब RMC और सरकार पर टिकी नजर
मामले में आगे की कार्रवाई अब Rajasthan Medical Council और राज्य सरकार के स्तर पर निर्भर है।
यदि समय रहते इस पर स्पष्ट और ठोस कार्रवाई नहीं होती है, तो यह मामला न केवल प्रशासनिक निष्क्रियता का उदाहरण बनेगा, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था में जवाबदेही पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करेगा।
जनता के भरोसे का सवाल
स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े ऐसे मामलों में पारदर्शिता और त्वरित कार्रवाई अपेक्षित होती है। जब जांच में अनियमितता सामने आने के बाद भी कार्रवाई लंबित रहती है, तो इससे आमजन के बीच अविश्वास की स्थिति पैदा होना स्वाभाविक है।
भंडारी हॉस्पिटल प्रकरण में प्रारंभिक जांच ने कई महत्वपूर्ण तथ्यों को उजागर किया है, लेकिन अब तक की स्थिति यह संकेत देती है कि मामला कार्रवाई की बजाय प्रक्रिया में उलझकर रह गया है।
आने वाले समय में संबंधित संस्थाओं द्वारा उठाए जाने वाले कदम ही तय करेंगे कि इस मामले में जवाबदेही तय होती है या नहीं।