जयपुर, 6 अप्रैल 2026(न्याय स्तंभ)।
6 अप्रैल 1980 को स्थापित भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) आज अपना 47वां स्थापना दिवस मना रही है। देशभर में झंडारोहण, कार्यक्रमों और सदस्यता के जश्न के बीच एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो रहा है—क्या पार्टी का मूल आधार, यानी कार्यकर्ता, सच में खुश है?
भाजपा जहां खुद को दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बताती है, वहीं राजस्थान में एक सोशल मीडिया हैंडल पर तीन मिलियन सदस्यों का आंकड़ा भी जोर-शोर से पेश किया जा रहा है। लेकिन पार्टी के अंदर से ही इन आंकड़ों पर सवाल उठने लगे हैं। एक पूर्व आईटी सेल पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि “ये आंकड़े जमीनी हकीकत से ज्यादा डेटा मैनेजमेंट का खेल लगते हैं। मौजूदा आईटी टीम विपक्ष के हमलों का जवाब तक सही से नहीं दे पा रही, ऐसे में इतने बड़े सदस्यता आंकड़े सवाल खड़े करते हैं।”
वहीं संगठन और सरकार के बीच बढ़ती दूरी भी अब छिपी नहीं रह गई है। एक वरिष्ठ पूर्व पदाधिकारी का कहना है कि “अब संगठन में समर्पण कम और दिखावा ज्यादा हो गया है। कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है। अधिकारी उनकी सुनते नहीं, और संगठन में भी उनकी पूछ कम हो गई है।”
उन्होंने यह भी कहा कि संघ की पकड़ कमजोर होने के बाद पार्टी में अनुशासन और कार्यकर्ता संस्कृति भी कमजोर पड़ी है, जिससे भाजपा “बेलगाम” होती जा रही है।
सबसे चिंताजनक स्थिति जनप्रतिनिधियों की बताई जा रही है। भाजपा के सांसद और विधायक खुद अपनी साख बचाने के संघर्ष में लगे हुए हैं। कार्यकर्ताओं के काम कराने के लिए वे अधिकारियों के चक्कर काटते हैं, लेकिन नतीजा शून्य रहता है।
एक पुराने कार्यकर्ता ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “आजकल सांसद और विधायक सिर्फ कार्यक्रमों में फोटो खिंचवाने के लिए नजर आते हैं। जनता का काम करवाने की उनकी क्षमता लगभग खत्म हो चुकी है।
स्थापना दिवस के इस मौके पर जहां एक तरफ जश्न का माहौल है, वहीं दूसरी तरफ कार्यकर्ताओं की यह पीड़ा भाजपा नेतृत्व के लिए एक बड़ा संकेत है। अगर समय रहते इन मुद्दों पर मंथन नहीं किया गया, तो यह असंतोष आने वाले समय में पार्टी के लिए चुनौती बन सकता है।
नोट- ये खबर भाजपा के ही कुछ पुराने कार्यकर्ता से बात करके बनाई गई है.