संकट चौथ व्रत का महत्व और कथा

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  प.नीरज शर्मा
 "सकट चौथ व्रत महात्मय"
यह व्रत माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। यह व्रत स्त्रियाँ अपने सन्तान की दीर्घायु और सफलता के लिये करती हैं। इस व्रत के प्रभाव से सन्तान को रिद्धि-सिद्धि की प्राप्ति होती है तथा उनके जीवन में आने वाली सभी विघ्न-बाधायें गणेश जी दूर कर देते हैं। इस दिन स्त्रियाँ पूरे दिन निर्जला व्रत रखती है और शाम को गणेश पूजन तथा चन्द्रमा को अर्घ्य देने पश्चात् ही जल ग्रहण करती हैं।
व्रत की विधि-माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को सकट का व्रत किया जाता है। इस दिन संकट हरण गणपति का पूजन होता है। इस दिन विद्या, बुद्धि, वारिधि गणेश तथा चन्द्रमा की पूजा की जाती है। भालचंद्र गणेश की पूजा सकट चौथ को की जाती है। प्रात:काल नित्य क्रम से निवृत होकर षोड्शोपचार विधि से गणेश जी की पूजा करें। निम्न श्लोक पढ़कर गणेश जी की वंदना करें :-गजाननं भूत गणादि सेवितं,कपित्थ जम्बू फल चारू भक्षणम्। उमासुतं शोक विनाशकारकम्, नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम्॥
      इसके बाद भालचंद्र गणेश का ध्यान करके पुष्प अर्पित करें।पूरे दिन मन ही मन श्री गणेश जी के नाम का जप करें। सुर्यास्त के बाद स्नान कर के स्वच्छ वस्त्र पहन लें। अब विधिपूर्वक (अपने घरेलु परम्परा के अनुसार) गणेश जी का पूजन करें। एक कलश में जल भर कर रखें। धूप-दीप अर्पित करें। नैवेद्य के रूप में तिल तथा गुड़ के बने हुए लड्डु, ईख, गंजी (शकरकंद), अमरूद, गुड़ तथा घी अर्पित करें।
      यह नैवेद्य रात्रि भर बांस के बने हुए डलिया (टोकरी) से ढ़ंककर यथावत् रख दिया जाता है। पुत्रवती स्त्रियाँ पुत्र की सुख समृद्धि के लिये व्रत रखती है। इस ढ़ंके हुए नैवेद्य को पुत्र ही खोलता है तथा भाई बंधुओं में बाँटता है। ऐसी मान्यता है कि इससे भाई-बंधुओं में आपसी प्रेम-भावना की वृद्धि होती है। अलग-अलग राज्यों मे अलग-अलग प्रकार के तिल और गुड़ के लड्डु बनाये जाते हैं। तिल के लड्डु बनाने हेतु तिल को भूनकर, गुड़ की चाशनी में मिलाया जाता है, फिर तिलकूट का पहाड़ बनाया जाता है, कहीं-कहीं पर तिलकूट का बकरा भी बनाते हैं। तत्पश्चात् गणेश पूजा करके तिलकूट के बकरे की गर्दन घर का कोई बच्चा काट देता है।
        चौथ व्रत की कथा                   
एक सेठ और एक सेठानी थे। वह धर्म पुण्य को नहीं मानते थे। इसके कारण उनके कोई बच्चा नहीं था। एक दिन साहूकारनी पडोसी के घर गयी। उस दिन सकट चौथ था, वहा पड़ोसन सकट चौथ की पूजा कर के कहानी सुना रही थी। 
      सेठानी ने पड़ोसन से पूछा - "तुम क्या कर रही हो ?" तब पड़ोसन बोली की आज चौथ का व्रत है, इसलिए कहानी सुना रही हूँ। तब साहूकारनी बोली चौथ के व्रत करने से क्या होता है ? तब पड़ोसन बोली इसे करने से अन्न, धन, सुहाग, पुत्र सब मिलता है। तब साहूकारनी ने कहा यदि मेरा गर्भ रह जाये तो मैं सवा सेर तिलकुट करुँगी और चौथ का व्रत करुँगी। श्री गणेश भगवान की कृपा से सेठानी के गर्भ रह गया। तो वह बोली की मेरे लड़का हो जाये, तो में ढाई सेर तिलकुट करुँगी। कुछ दिन बाद उसके लड़का हो गया, तो वह बोली कि "हे चौथ भगवान ! मेरे बेटे का विवाह हो जायेगा, तो सवा पांच सेर का तिलकुट करुँगी।" कुछ वर्षो बाद उसके बेटे का विवाह तय हो गया और उसका बेटा विवाह करने चला गया। लेकिन उस साहूकारनी ने तिलकुट नहीं किया। इस कारण से चौथ देव क्रोधित हो गये और उन्होंने फेरो से उसके बेटे को उठाकर पीपल के पेड़ पर बिठा दिया। सभी वर  को खोजने लगे पर वो नहीं मिला, हतास हो कर सरे लोग अपने अपने घर को लोट गए। इधर जिस लड़की से साहूकारनी के लड़के का विवाह होने वाला था, वह अपनी सहेलियों के साथ गणगौर पूजने के लिए जंगल में दूब लेने गयी। 
      तभी रास्ते में पीपल के पेड़ से आवाज आई-"ओ मेरी अर्धब्यहि" यह बात सुनकर जब लड़की घर आयी उसके बाद वह धीरे-धीरे सुख कर काँटा होने लगी। एक दिन लड़की की माँ ने कहा - "में तुम्हे अच्छा खिलाती हूँ, अच्छा पहनाती हूँ, फिर भी तू सूखती जा रही है ? ऐसा क्यों ?" तब लड़की अपनी माँ से बोली की वह जब भी दूब लेने जंगल जाती है, तो पीपल के पेड़ से एक आदमी बोलता है की ओ मेरी अर्धब्यहि।  उसने मेहँदी लगा रखी है और सेहरा भी बबाँध रखा है। तब उसकी माँ ने पीपल के पेड़ के पास जा कर देखा की यह तो उसका जमाई है। तब उसकी माँ ने जमाई से कहा - "यहाँ क्यों बैठा है ? मेरी बेटी तो अर्धब्यहि कर दी और अब क्या लेगा ?"
      साहूकारनी का बेटा बोलै - "मेरी माँ ने चौथ का तिलकुट बोला था लेकिन नहीं किया, इस लिए चौथ माता ने नाराज हो कर यहाँ बैठा दिया।" यह सुनकर उस लड़की की माँ साहूकारनी के घर गई और उससे पूछा की तुमने सकट चौथ का कुछ बोला है क्या ? तब साहूकारनी बोली - तिलकुट बोला था। उसके बाद साहूकारनी बोली मेरा बेटा घर आ जाये, तो ढाई मन का तिलकुट करुँगी। 
      इससे श्री गणेश भगवन प्रसन्न हो गए और उसके बेटे को फेरों में ला कर बैठा दिया। बेटे का विवाह धूम धाम से हो गया। जब साहूकारनी के बेटे बहु घर को आ गए तब साहूकारनी ने ढाई मन तिलकुट किया और बोली हे चौथ देव ! आप के आशीर्वाद से मेरे बेटा बहु घर आये है, जिससे में हमेशा तिलकुट करके व्रत करुँगी। इसके बाद सारे नगर वासियो ने तिलकुट के साथ सकट व्रत करना प्रारम्भ कर दिया। 
      है संकट चौथ जिस तरह साहूकारनी को बेटे बहु से मिलवाया, वैसे हम सब को मिलवाना। इस कथा को कहने सुनने वालों का भला करना। 



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