सीएलसी-लूट का खेल जारी, ईएसटीपी के पैसे की फिर तैयारी

सीएलसी-लूट का खेल जारी, ईएसटीपी के पैसे की फिर तैयारी

जयपुर-स्वायत्त शासन विभाग द्वारा नगर निगम में संचालित और एनयूएलएम के अंतर्गत चलने वाले संस्थान शहरी आजीविका केंद्र संस्थान को किसी का भी डर नहीं है। डीएलबी से उठाए हुए प्रोजेक्ट इएसटीपी में पहले ही कई बार इसके खिलाफ पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज हो चुकी है वहीं अधिकारी बिना इसकी जांच करवाएं ही इसको  करोड़ो रुपया देने की तैयारी में लगे हुए हैं। फर्जी बिलों के माध्यम से करोड़ों रुपये अभी तक उठाने वाली संस्था को किसी का भी डर नहीं है। वहीं दूसरी और इस संस्था के अध्यक्ष और सयुंक्त निदेशक वीडी सकरवाल से बात की तो उनका कहना था कि जांच में किसी प्रकार की अनियमिता नहीं पाई गई और राजीनामा होने के कारण केस वापस कर लिया गया है। लेकिन यहां ये बात गले नही उतरती की अपराध करके अपराधी माफी मांग ले तो क्या उसका गुनाह कम हो जाता है।

नगर निगम में महापौर ओर अधिकारियों की नाक के नीचे सब चल रहा है लेकिन उसके बाद भी सब आंखे बंद कर इसकी वित्तिय अनियमितताओं को देख रहे हैं। 

सांख्यकी विभाग से निगम में आये डीपीओ श्रीचंद वर्मा से बात की गई तो उन्होंने कहा कि हमारे पास इसके कोई कागज नहीं है। इसका संचालन डीएलबी से किया जाता है। लेकिन यहां प्रश्न यह है की जब किसी को जन्म या मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाना हो, अपने मकान का पट्टा लेना हो या नाम ट्रांसफर करवाना हो  तो निगम पिछली सात पीढ़ियों के डाक्यूमेंट्स मांग लेता है। लेकिन करोड़ो की हेराफेरी करने वाली इस संस्था के संपुर्ण कागज लेना भी निगम ने वाजिब नहीं समझा।
जब सूचना के अधिकार के तहत इसके कागज मांगे गए तो पूरे कागज नहीं देकर केवल कुछ जानकारी दे दी गई। और ये कह कर अपना पल्ला झाड़ लिया गया कि हमारे पास संस्था के रजिस्ट्रेशन के कोई  दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। या वो देना ही नहीं चाहते ये सब तो वो ही जाने। लेकिन एक बात तो प्रमाणित है कि स्वायत्त शासन विभाग से लेकर नगर निगम की मिलीभगत से करोड़ो की हेराफेरी चल रही है।
फर्जी संस्थान से उठा रहे बिल
जानकारी में आया है कि स्वायत्त शासन विभाग के एक अधिकारी द्वारा संचालित फर्म है उसके नाम से लाखों के फर्जी बिल उठाए जाते है जिससे जरूरत मंदों की मदद तो नहीं होती लेकिन उन सबकी जेब भर जाती है जो संस्था के मुख्य धारा में कार्य करते हैं। इसी प्रकार संस्था में कार्यरत कर्मचारियों के नाम से भी कुछ फर्म है जिनका भुगतान बिना कार्यों के ही कर दिया जाता है।

नोट शीट के आधार पर चल रहा है सब कुछ
मिली जानकारी के अनुसार जब से संस्था अस्तित्व में आई तब से ही इसमें गोलमाल चल रहा है। पहले केवल नोटशीट के आधार पर ही संस्था का चयन कर लिया गया। फिर नोटशीट के आधार पर ही नयी संस्था रजिस्टर्ड कर अपने चहेतों को दे दिया काम। जिसको नियम अनुसार एक निकाय क्षेत्र में ही कार्य करना था उसे बिना नियमों के प्रदेशस्तर की जिम्मेदारी जो कि गलत है लेकिन डीएलबी में इस संस्था के अध्यक्ष और संयुक्त निदेशक शायद इस से कोई मतलब नहीं रखते। उनका कहना है कि उनकी जानकारी में कुछ नही है। प्रोजेक्ट निदेशक स्तर पर सब कुछ तय होता है।

*अधिकारी पैसे लेकर करते हैं नियुक्ति*
जानकर सूत्रों से पता चला कि स्वायत शासन विभाग स्तर से एनयूएलएम योजना में नियुक्ति खाली हाथ नहीं पहले प्रसाद चढ़ाने पर ही मिलती है। सूत्रों ने बताया कि करीब एक लाख रुपए देकर नियुक्ति का खेल चलता है। जिसको पूछने वाला कोई नहीं है। अभी हाल ही मैं बहुत सारी नियुक्तियां की गई है।लेकिन कोई बोलने को तैयार नहीं क्योंकि योग्यता यहाँ कोई मायने नहीं रखती।
अपने चहेतों ओर रिश्तेदारों को नौकरी
न्याय स्तंभ को मिली जानकारी के अनुसार स्वायत्त शासन विभाग और निगम के अधिकारियों-कर्मचारियों के रिश्तेदार और चहेतों को यहां नौकरी पर रखा जाता है। जिससे सब का काम चलता रहे और जनता और योग्यता जाए भाड़ में। अगर सरकार द्वारा इसकी जांच करवा ली जाए तो कई अधिकारियों के रिश्तेदार नगर निकायों में नौकरी करते मिल जाएंगे।
लेकिन कौन कार्रवाई करे क्योंकि सब गोलमाल है।