कविता इंसान होने की पहचान कराती है

कविता इंसान होने की पहचान कराती है

साहित्यकार एवं अनुवादक डॉ. मुन्नी गुप्ता से पत्रकार राजीव कुमार झा की बातचीत

न्याय स्तंभ

सवाल : आप प्राध्यापिका हैं. काव्य लेखन से भी आपका जुड़ाव है. आप कविता में अपनी संवेदना और अनभूतियों के बारे में क्या महसूस करती हैं ?

जवाब : हाँ, ये सच है, मैं अध्यापिका हूँ। जिस तरह एक शरीर को जिंदा बने रहने के लिए दिल जरूरी है, ठीक उसी तरह इंसान के जिंदा रहने के लिए कविता जरूरी है क्योंकि कविता ही आदिम आवाज़ थी। पहली बार जंगल से आदमी होने की विकासगाथा में पहली आह - पहला रुदन और पहली पीड़ा पहला गान बनकर निकली थी - कविता। 

आदम, आदमी और नागरिक तो बहुतेरे हैं, कविता जो है वो इंसान होने की पहचान कराती है। जो देखती हूँ वही लिखती हूँ वही कहती हूँ इसे ही मैं कविता की ताकत मानती हूँ। कहा, सहा, रहा और जो रगों में बहा - वही रचा, वही सच्चा लेखन है, वही सच्ची कविता है और वही सच्चा साहित्य भी। हाँ एक बात है जो कहना चाहती हूँ कि कविता में किस्सा और किस्से में कविता यही एक परम्परा है जिसका निर्वाह मैं करती आ रही हूँ, चाहे जो भी कविता उठाकर आप देख लें, वहाँ आपको यही हकीकत मिलेगी। कविता एक यात्रा है इस पार से उस पार की, जो हमें आपको हम सबको और इस कायनात को आपस में जोड़े रहती है। 

सवाल : कविता के व्यापक संसार में कवयित्री के रूप में आप अपने नारी मन के विचलन और  चिंतन के बारे में किस तरह देखती हैं ?

जवाब : मुझे इतना मालूम है कि मैं इंसान हूँ और कवि। जेंडर आप अपने हिसाब से सुविधा से लगा सकते हैं। कुदरतन चूँकि इंसान के दो तरह की शरीर संरचनाएं हैं तो एक आपकी तरह के लोग हैं और दूसरे हम जैसे । यूँ तो कवि का कोई जेंडर होता नहीं, न हुआ, न होना चाहिए । 
रहा सवाल नारी मन का तो पूरा इंसान होने में एक मनुष्य बनने के पीछे  स्त्रीलिंग और पुल्लिंग दोनों की बराबर भूमिका होती है, कविता तभी पैदा होती है, सम्पूर्ण रूप से जिसे कविता कहा जा सके - पूरे तौर पर वह तभी संसार में आती है जब इन्सान अर्धनारीश्वर हो उठे। अर्धनारीश्वर हुआ कि कविता जगी और यह स्थिति दृश्य-अदृश्य के बीच जागृत होने की अवस्था में ही घटता है- एक इंसान होने की खूबी, कविता की पहचान औऱ नारी मन का गान।

अब मन के विचलन का क्या कहें ! नर-नारी सब अपने-अपने समय में जो कुछ भी देखते सुनते हैं कहीं न कहीं विचलित होते ही हैं फिर सम्भलते भी हैं और विचलन हमेशा बुरा या घातक नहीं होता। अक्सर बड़े विचलन देखिये तो कुदरत में जब भी हुए हैं पुराना तोड़कर ही नया कुछ बनता आया है यही विचलन सार्थक माना गया । जैसे एक लेखक छेड़े हुए राग में भी नया साज ढूँढ़ लेता है वैसे ही मन और विचलन भी कुछ हमेशा नया ढूँढ़ते रहते हैं । रहा सवाल चिन्तन का तो नर-नारी के बिना कोई चिन्तन परम्परा हो, वो अधूरी ही रहेगीI भले ही लाख दर्जे उसमें वजनदार दर्शन भरा पड़ा हो, बिना एक-दूजे के भीतर गहरे उतरे हुए न कोई दर्शन पूर्ण होगा, न कोई मनोविज्ञान I  तो फिर भला चिन्तन कैसे पूरा हो अकेले। कोई स्त्री अकेले ही चिन्तन से कतई कोई नई दुनिया नहीं खड़ी कर सकती, वहाँ सम्यक भाव न हुआ तो सब व्यर्थ । चिन्तन परम्परा में नर-नारी एक-दूजे के पूरक हैं, यही मान्यता भारतीय चिन्तन परम्परा और सम्पूर्णता में दर्शन की रही है । 

सवाल : समकालीन हिंदी कविता में नारीवादी कविताओं के हस्तक्षेप की सार्थकता के बारे में अपने विचारों को प्रकट कीजिए .

जवाब : हाँ, ठीक है। आप ऐसे भी देख सकते हैं। कुछ लोग मर्दवादी लिख रहे हैं कुछ लोग स्त्रीवादी। जहाँ वाद आ गया, वहीं संवाद है वहीं विवाद है। सिद्धि और प्रसिद्धि में बड़ा फर्क है। मनुष्यता का स्टैण्डर्ड होने की पहचान कराने वाला जो भी लेखन रहा है उसे माना जाना चाहिए। आप इस बात पर वाद-विवाद-बहस कर सकते हैं कि स्त्रियों की पहचान उपनिषद, पुराण और महाकाव्यों में जिन प्र्तिश्रुतियों जिन आधारों पर हुई है उनसे आगे ले जाने वाले कौन से मूलभूत सम्यक दृष्टि पैदा करने वाले विचार आज सामने आए। स्त्रीवादी होना एक सामने खड़ी दूसरी आइडेंटिटी यानी बलवती आइडेंटिटी के सामने खड़े होना है। उसमें आरोप प्रत्यारोप, गुण-दोष, सिद्धांत-दर्शन, शास्त्रीयता और आधुनिकता तमाम-तमाम दृष्टियाँ हो सकती हैं। वाद कब खड़ा हो जाय कोई नहीं जान सकता और वादी कब होता है आदमी, इस बात पर विचार होता रहना चाहिए।

नर और नारी कोई आक्सीजन और कार्बनडाई आक्साइड तो हैं नहीं कि एक अच्छा दूजा जानलेवा । वो तो इलेक्ट्रान, प्रोटान और न्यूट्रान की तरह हैं । यत्र तत्र सर्वत्र विराजमान । इन दोनों के बिना दुनिया की कल्पना निरर्थक है । अब रहा सवाल नारीवाद का तो आपस में थोड़े बहुत तनाव और रस्साकसी भी न हो तब कैसे अपने-अपने एग्जिस्टेंस को दोनों साबित करेंगे । सो ये द्वंद्व, यह तनाव, यह संघर्ष, यह घर्षण आप जो भी समझ लें बहुत हद तक जरूरी भी है ।वादी के साथ कविताओं की अपनी खरी और खोटी दोनों ही कसौटियाँ हैं । वाद के साथ अपनी खूबी और खराबियाँ हैं । तो नारीवादी कविताओं में भी वो तो दिखेगा । कविता तो स्वतंत्र अभिव्यक्ति है नारीवादी कविता कोई सोचकर थोड़े ही निकलती है वो तो आप और हम उसे बांधते छोड़ते रहते हैं यही अभ्यास है जिसे हर बार नई-नई कसौटी में कसा जाता रहेगा ।

सवाल : अपने बचपन घर-परिवार और पढ़ाई-लिखाई के बारे में बताइए .

जवाब : परिवार में माँ, बाबा और बहने हैं।  मैं ज्यादा भाग्यशाली रही कि गरीब परिवार में जन्म लेने और घर में पाँच लड़कियाँ होने के बावजूद कभी भी यह एहसास न हुआ कि मैं लड़की हूँ। लड़के-लड़की में भेद जैसा कभी कुछ रहा नहीं। हाँ कभी-कभी पिता को लगता था कि एक लड़का होना चाहिए था, खासकर उन पलों में जब पारिवारिक कलहें होती थीं बहुत बहुत छोटी छोटी पुश्तैनी चीजों को लेकर दादा, चाचा से। बाबा को लगता कि एक लड़का होता तो मेरी ओर से लड़ता। मुझसे कहते चलो, "आज इनके यहाँ, तुम बात करना। तुम पढ़ी-लिखी हो, तो कागज-पत्तर समझती हो।" तब मेरा यही जवाब होता था “मैं लाठी चलाने नहीं जाऊँगी। मैं खुद एक दिन इतना कमाने लगूँगी जितने की हमारी जरूरत है। आप चिंता मत करिए।" तब मेरी उम्र पन्द्रह सोलह रही होगीI 

परिवार में चाची-चाचा, दादा इस हक में नहीं थे कि सम्पत्ति के साझे में बाबा भागीदार हों और उनसे उलझने का मेरा कभी मन न होता था। इन सबके बीच माँ ताकत बनी रही और बताती जाती कि, "देखो दुनिया ऐसी ही है। इसलिए अपनी ताकत खुद बनो। अगर खुद नहीं खड़ी होगी कभी तो कोई तुम्हें नहीं पूछेगा।" यह मेरे लिए जीवन का मूलमंत्र बना , पढ़ाई-लिखाई को लेकर माँ का पूर्ण सहयोग मिला। एकमात्र उनके ही परिश्रम का ही फल है कि मैं आज यहाँ खड़ी हूँ। मैं अपनी माँ का सपना थी। मुझे ख़ुशी है उसे मैंने पूरा किया। रहा सवाल खानपान और रहन-सहन का तो एक छोटे से कमरे के घर में पली बढ़ी। 14 साल की उम्र से ही ट्यूशन पढ़ाकर घर खर्च उठाया और खुद की और बहनों की पढ़ाई इन मोर्चों पर डटी रही। सारे संघर्षों के पीछे माँ का हौसला और सहयोग सम्बल बना रहा। हाँ इस सफर में मुझसे न जाने क्यूँ रंजिश रखने वाले कम न थे और आगे भी कम न होंगेI 


सवाल : कविता लेखन के अलावा आपने अनुवाद का काम भी किया है. साहित्य में अनुवाद की रचनात्मकता  के बारे में आपके क्या विचार हैं ?

जवाब : साहित्य में रचनात्मकता ये बहुत बढ़िया बात कही आपने। अनुवाद बिलकुल अभी तक हमारे यहाँ यानी अकादमिक संस्थानों और समाज में दुहाजू की बीबी रहा है। अनुवाद के साथ हमेशा दोगला व्यवहार किया जाता रहा क्योंकि हमारे बहुतायत बड़े से समाजों के भीतर दोगलापन बहुत है इसलिए अनुवाद को वह जगह और पहचान कभी नहीं मिल सकी जो कम से कम या खासकर ओरिजिनल राइटिंग को मिली है। वजह, हमारी जुबान हमारी तो बनी रही और तुम्हारी ज़ुबान दुहाजू की बीबी। जिस दिन हम इस दोगलेपन से बाहर निकलने के बारे मे सोचेंगे अनुवाद का स्तर बेहतर होता जाएगा।

दूसरी जरूरी बात, जिस किताब का अनुवाद मैंने किया - आप खुद ही देख लें 90 साल बाद अनुवाद हुआ बांग्ला से हिंदी में। भद्रलोक के हिन्दुस्तानी जुबान बोलने वाले और बांग्लाभाषी समाज के लोगों ने क्या सुलूक किया अपनी जमीन की ही मौलिक रचना के साथ ? आप इसी से अंदाज़ लगा सकते हैं। यहाँ रहनेवाले लोगों ने क्यूँ नहीं किया इसका अनुवाद ? और किया भी तो अंग्रेजी में, जिसमें हमारी जीवनशैली अनुवाद भला कैसे होगी ? भद्रलोक किसी भी भाषा का हो अपने चेहरे पर दाग देखने का आदी नहीं। जबकि दाग हमेशा ही बुरे नहीं होते कभी कभी आदमी बनने के लिए यही दाग सही रास्ते की तरफ जो मोड़ हैं उधर मुड़कर आपको लिए चलते हैं।

सवाल : हिंदी में बांग्ला रचनाओं के अनुवाद क्यों लोकप्रिय हैं ?

जवाब : बांग्ला साहित्य सही मायने में भारतीय साहित्य में अब तक का जाँचा परखा आधुनिक साहित्य है, जिसमें हमारे तमाम समाजों की कुंठाएं, पाखण्ड, कुरीतियां, कुप्रथाएं सबको बड़ी धारदार और तार्किक तरीके से आधुनिक शैली में कहा सुना गया है और हमारी खामी यह है कि हिंदी समाज को इन्हीं खामियों से बड़े ही करीब का नाता और अकूत लगाव है। हालांकि बांग्ला साहित्य में उदात्तता,  सांस्कृतिकता और वैचारिक समन्वयता के साथ आधुनिकता के जो तत्त्व हैं, हिंदी साहित्य ने उससे बहुत कुछ सीखा और ग्रहण भी किया है । यही बांग्ला की लोकप्रियता के पीछे की एक बड़ी वजह बन। ये अलग बात है कि अन्तर्विरोध हर जगह मौजूद हैं , होने भी चाहिए I 

दूसरी बात, संस्कृत साहित्य हिंदी के मुकाबले समृद्ध साहित्य रहा है, संस्कृत के बाद तमिल और बांग्ला साहित्य ने इस परम्परा को आगे बढ़ाया और वो इस हद तक आगे गई कि दुनिया की जो बेहतरीन संस्कृतियाँ और शैलियाँ हैं, उन्हें अपने साहित्य में स्थानिक और संस्थानिक दोनों ही स्तरों पर प्रचार-प्रसार के माध्यमों के जरिये पहुँचाने का काम किया। 

हिंदी की दो परम्पराएं हैं- एक समृद्ध परम्परा है जिसमें वैदिक, सनातन से लेकर मिथकीय साहित्य और सूफी, संत, पीर, फकीर, वाचक, आल्हा आदि से होते हुए क्रांतिकारी, तार्किक और चिन्तन की रहस्यवादी व दार्शनिक परम्परा रही है दूसरी तरफ संकुचित और सीमित पराकाष्ठाओं निहित स्वार्थों की संकीर्णतावादी श्रेणियाँ हैं जहाँ सर्वश्रेष्ठ और महान साबित करने की परम्परा है दिग्दिगन्त परिनिष्ठित और मानक हिंदी के क्षेत्रीय और जातीय संस्कारों वाले समूह हैं। हिन्दुस्तानी से इतर शुद्धिकरण की मूल मान्यताओं से ग्रसित प्रतिष्ठित हिंदी के सूबेदार हैं, जो अपने संसाधनों और संचार माध्यमों के कारण सुदूर देशों तक भी प्रचुर मात्रा में फैले हैं वो आन्दोलन भी चला आ रहा है।  उसकी अपनी क्षेत्रीयता है, पहचान है, अस्मिता है, जातीयता है।  उसके घनिष्टतम-सघनतम और उसकी क्षेत्रीयता में कहीं थोड़े बहुत जोर दबाव हैं । इन्कलाब और प्रगतिशीलता, प्रेम और परम्परा का शोर है और ये सब कुछ अन्य भारतीय संस्कृतियों से लेने की एक आदत सी पड़ी हुई है , हालांकि ये कोई बुरी बात नहीं।

इसी तरह हिंदी में होने वाले वो अनुवाद भी हैं, जो अन्य भारतीय भाषाओं से हुए हैं उन कृतियों के अनुवादों में भी सिलेक्टिव और पर्सपेक्टिव दोनों ही मानदंड अपनाये गये हैं, जिन्हें बड़े प्रतिष्ठित तरीके से एक्सेप्ट करने की विधि विकसित करने की कोशिशें जारी रही हैंI जाहिर है अनुवाद में यहाँ वो चुनाव न होगा जो समाज को चाहिएI  हाँ, वो चुनाव यकीनन होगा, जिसमें बाज़ार और एक ख़ास तरह का विचारवादी जमात या संसार या तरक्कीपसंद कुनबा एक बड़ा बाज़ार बना रहे सो यहाँ ख़ास तौर से मेलों और विशेष प्रकार के हिंदी बाज़ार के खेलों की मांग भी शामिल है। यही बुनियादी फर्क है हिंदी और बांग्ला साहित्य में या कहें अनुवाद और सृजन दोनों ही मामलों में  और सबसे बड़ी बात यह ज्ञान परम्परा जो विकसित हुई, जो यह कसौटी है परखने की और यह जो दृष्टि आलोचना की बनी यह सब मुझे हिंदी के मूर्धन्य विद्वान मेरे परम आदरणीय गुरुवर प्रो. गंगाप्रसाद विमल जी से मिला।

हालांकि बांग्ला समाज मे भी कहीं न कहीं भद्रलोक का शील और शैली लगभग वैसी ही हैं एक और बात, भद्र और गैर भद्रलोक का एक बड़ा अंतराल सांस्कृतिक समन्वय में पैदा हुई बांग्लाभाषी सांस्कृतिकता और दूसरी तरफ बांग्लाभाषा की शुद्धतावादी बौद्धिक तहजीब में काम करने वाले लोगों में बड़ी आसानी से देखी जा सकती है। फिर भी सामूहिक रूप से चेतना का जागरण जहाँ से भी आया बांग्ला नवजागरण ने साहित्य को समृद्ध तो किया ही । तभी यहाँ एक दबा हुआ तबका जोकि स्त्रियों का रहा है वो बड़ी तादाद में रचना की जमीन पर उतरकर सच लिखने के लिए प्रेरित हुआ, अनुरागी रहा।

सवाल : देवदास को एक अमर प्रेमकथा के रूप में लोग देखते हैं. इसका क्या कारण है ?
 
जवाब : इसकी बहुत साफ वजहें हैं। लोग पारो चाहते हैं मगर अपने घर की दहलीज में कोई पारो नहीं चाहता। यह ठीक वैसा ही है कि लोग भगत सिंह चाहते हैं लेकिन अपने घर मे कोई नहीं चाहता। इंकलाब सब चाहते हैं, शांति सब चाहते हैं, प्यार सब चाहते हैं। मगर अपने घर के भीतर की दीवारें टूटें इतनी ही आज़ादी और दूसरी तरफ अपनी दहलीज से बाहर अपनी परम्परा, तहजीब, रीति-रिवाज और बहार-भीतर के अकुलाते फ़ितूरों के कमरों में बंद जो वासनाएँ हैं संस्कारों, मूल्यों की बुनियादों में रहते हुए भी उन्हें पूरी करने की जबर आज़ादी चाहते हैं। देवदास अमर प्रेम कथा क्यूँ बनी भला। क्योंकि मयखानों से अब तक कोई इस तरह प्यार करने वाला नहीं निकला। मयकदे भी बहुत हुए और मयकश भी बहुतेरे। 

दूसरी बात दो तरह की प्रेमिकाएँ, दो तरह की रीतियाँ, एक तरफ तवायफ और दूजी राजघराने में पुश्तों से कामकाज करने वाले खानदान की बेटी पारो यानी दो रिवाज़, दो प्रथाएँ और उनसे देवदास के प्रेम की खींचतान। कथा की अंतर्यात्रा से अंजाम तक की जो जद्दोजहद है वो सेन्स भी न्यूसेंस भी और सेंसेशन भी पैदा करती है। देवदास की पटकथा यही बताती है कि भद्रलोक और उससे बाहर के समाजों की रीति और नीति में क्या अंतर है। एक और वजह है, देवदास के ख्यात होने की जब जमीन में जीने वाला आदमी तंग आ जाता है जेहालातों और जुल्मतों से, तब निजात चाहता है ऐसे समय में उसे क्या चाहिए दारू नहीं तो पारो या चन्द्रमुखी। जो प्यार कहीं नहीं मिल रहा समाज में, वो तो चाहिए आमजन को ताकि सुकून मिले और दमित इच्छाओं को शमित करने का कोई तो अवसर हों मगर फिर वही बात कि इन सब के बावजूद भी वह उसे अपने घर मे पारो या देवदास पैदा होने देना नहीं चाहता। यही द्वन्द है जिसकी वजह से यह कथा जानी जाती है।

रोज़ घरों से लड़कियाँ भागने को मजबूर क्यूँ हैं भला ? रोज़ प्रेमी जोड़े आत्महत्या करने की विवश क्यूँ हैं भला ? घरों और मन्दिरों में लड़कियाँ देवदासी ही बनी रहें यही पद्धतियाँ विकसित की जाने की तमाम तमाम कोशिशें चली आ रही हैं तो देवदास कहाँ होंगे इन समाजों में भला और कहाँ होंगी पारो ।  इसीलिए जवाँ रगों में ये प्रेमकथा अमर है और हमेशा ही अमर रहेगी ।

सवाल : साहित्य में आत्मिक विषय के रूप में प्रेम का स्वर किस तरह के संघातों से आहत दिखायी देता है ?

जवाब : जैसा कि मैंने ऊपर कहा, दो-दो सवालों के जवाब में। एक बात और जोड़ूँगी कि हिंदी साहित्य में आत्मिक प्रेम आध्यात्मिक तो हो गया, भक्तिमय भी हो गया मगर उसे सांसारिक प्रेम तक आने में अभी लम्बी दूरी तय करनी है। मीरा के कंठ से अभी तक विष उतरा नहीं है और कृष्ण अभी कलियुग में आया नहीं है। हमारे साहित्य और समाज दोनों में हम करना तो चाहते हैं प्रेम, जीना भी चाहते हैं प्रेम, होना भी चाहते हैं प्रेममय, पर ये जो हमारे भीतर की और हमारे बाहर की कुंडिया हैं, वो इतनी जोर से बंद कर दी गयी हैं कि बिना ताले लगे भी ये दरवाजे खुलने को राजी नहीं है। अब ये दरवाजे किस धातु, किस पदार्थ, किस मिट्टी के बने हैं, ये हम और आप बेहतर जानते हैं। हिंदी में हो चाहे अन्य भारतीय भाषाओं में प्रेम के किस्से सादे सुफैद कागजों पर रचे तो गये किन्तु उन अंधेरों की सिड़कियाँ नहीं खोल सके या खोलने की इच्छा तो थी पर बाहरी दबाव ज्यादा तेजधार थे सो ऐसा अभी तक हुआ नहीं । केवल कागज ही काले हुए । सच पर भी कालिख पोती गई , उजाला अभी बाहर आना बाकी है। 

सवाल : कोलकाता में हिंदी लेखन का माहौल कैसा प्रतीत होता है ?

जवाब : जैसे दुनिया का बाजार है और बाजार में तमाम जुबानें हैंI  हर जुबान में तमाम तमाम आक्रान्त गिरोह और उनके माफिया सक्रिय हैं। वैसे ही कलकत्ता में भी छोटी पत्रिकाओं से लेकर मेलों और बड़ी महफ़िलों तक की कलमें इन्हीं के चंगुल में फँसी पड़ी हैं, नया कुछ है नहीं। शरत और बंकिम से निकलकर हिंदी समाज भी यहाँ नये संसार में आया है जो थोड़ा कठिन है । और दूसरी तरफ इस  बाजार से बाहर दुनिया के तमाम देशों में बहुतेरे रचनाकार अपनी-अपनी माटी और वैश्विक दुश्वारियों से निबटने के हल तलाशने की खातिर लिख रहे हैं जूझ रहे हैं, टकरा रहे हैंI 

उसी तरह बंगाल में भी हिंदी के साथ यही तौर तरीके यही सलीके यही हथियार यही मोटे हथियार आजमाये जा रहे हैं। यहां हिंदी का मेला भी लगता है और उससे बाहर तमाम लेखक ऐसे भी हैं, जो वास्तव में इन तमाशाई जादुई और अचरजों से बाहर रहकर केवल नाम की शाख और कमाई की डाक पर नहीं टिके। वो इंसान होने और इंसान को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं ताकि उसकी सभ्यताएँ उसकी जुबानें जितना बचाई जा सकें उतना ही बेहतर है। यहाँ भी आलोचकों लेखकों की मण्डियाँ सजती हैं और सबके अपने मठ और मठाधीश हैं। जहाँ रोजाना नियमतः शीश नवाया जाता है और किसे उठाया गिराया जाय इसी का समीकरण बनता बिगड़ता रहता हैI 

सवाल : आजकल क्या लिख रही हैं ?

जवाब : आपको बता दूँ कि मेरे दो अनुवाद आ चुके हैं जिनमें एक बंगाल का सबसे महत्वपूर्ण काम है, ‘एक विदुषी पतिता की आत्मकथा’ जो मूल रूप से १९२९ में छपी। हिंदी में पहली बार ९० साल बाद इसका अनुवाद हुआ । इस किताब में एक वेश्या स्त्री के द्वारा उठाये गये अहम् सवाल दर्ज हैं वो आज भी पूरी तरह से प्रासंगिक ठहरते हैं । दूसरा अनुवाद है  ‘प्रेयसी नहीं मानती’। बांग्ला समाज में अद्भुत और विशिष्ट अंतरंग प्रेम को छू लेने वाली कविताएँ हैं। हाल ही में एक काव्य-संग्रह भी आया  – ‘कविता पर मुकदमा’। इसे देखा जाना चाहिए। 

अब रही बात इस लोकडाउन में लॉक होकर क्या काम किये जाएँ तो जल्द ही दूसरा संग्रह भी आने की तैयारी है । साथ ही एक और जरूरी किताब जो उपन्यास के फॉर्म में आप लोगों तक जल्द ही उपलब्ध होगी । बांग्ला स्त्री-आत्मकथाओं पर लम्बे समय से काम कर रही हूँ वो किताब भी जल्द ही आने की कोशिशें जारी हैं I कथाकार कृष्णा सोबती को अब तक सम्पूर्ण रूप में देखने की जहाँ तक बात है उसको लेकर तमाम तरह की क्रांतियां और भ्रांतियां दोनो रही हैं लेकिन फिलहाल तक उनकी मौलिक सोच को सही तौर से आंका भाँप नहीं जा सका है I जल्द ही इस पर समग्रता के साथ किताब आने की सम्भावना है I 

सवाल : आपने बांग्ला से हिंदी में ‘एक विदुषी पतिता की आत्मकथा’ नामक जिस पुस्तक का अनुवाद किया है. इस पुस्तक के शीर्षक की सार्थकता के बारे में बताइए ?

जवाब : इस किताब को लेकर बहुत सारे सवाल हैं। मुझे लगता है होने भी चाहिए क्योंकि यह किताब और इसके भीतर जो तमाम तरह की कड़वी सच्चाईयाँ दर्ज हैं उनसे होकर जब आप गुजरेंगे तो एक कोलाहल एक हलचल और एक बेचैनी आपको घेर लेती है। एक अनचाहा शोर और एक अनचाही तकलीफ आपको दबोच लेती है। इसी से गुजरते हुए जब आप इसके शीर्षक पर नज़र डालेंगे तो कौंधेगा भला पतिताएँ कब से विदुषी हो गईं ? ये सवाल भी मन में उठेगा कि अगर कोई स्त्री विदुषी है तो भला पतिता क्यों होने लगीं ? तो इस मायने में हमारे समाज के भीतर ऐसी विदुषी स्त्रियाँ भी मौजूद हैं, जिन्हें हमारा समाज पतिता होने के लांछन लगाने से बाज़ नहीं आता। 

दूसरी बात हमारा समाज इस बात को स्वीकारने और मानने से इंकार करता है कि कोई पतिता है तो वह विदुषी तो हो ही नहीं सकती और ये दोनों बातें  आपको इस किताब में खरी-खरी और खुली-खुली मिलेंगी। हिंदी भाषी समाज को अपनी आंखें खोलने के लिए और बांग्ला समाज को तथाकथित भद्रलोक की छल-छद्म करतूतों से बेपर्दा होने के लिए इस किताब से गुजरना जरूरी है। इसीलिए मानदा ने खुद स्वीकार किया और कहा कि यह एक शिक्षित पतिता की आत्मकथा है और किताब के भीतर की तार्किक बहसें, सच्चाइयाँ, असरदार जवाब तथाकथित चेहरों पर एक दाग छोड़ जाता है।

साभार—पत्रकार राजीव कुमार झा